गाजर घास के साथ मेरे दो दशक (भाग-1) - पंकज अवधिया एक राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन मे भाग लेने मै बस से जबलपुर से मंडला जा रहा था। यह 1998 की बात है। सडक के दोनो ओर गाजर घास फैली हुयी थी। जब बस घाटी मे पहुँची तो जंगलो के अन्दर भी मुझे इसका फैलाव दिखा। मैने एक सहयात्री से पूछा ’ ‘ क्या आप इसे पहचानते है? ’ उन्होने तपाक से कहा, ’ हाँ यह राम फूल है? ’ गाजर घास जैसे हानिकारक़ खरपतवार के लिये इतना अच्छा नाम सुनकर मुझे क्रोध आया और अचरज भी हुआ। फिर जब उन्होने इस नाम के पीछे छिपे कारण को बताया तो सब समझ मे आ गया। ‘ यह उसी तरह हर जगह फैली हुयी है जिस तरह भगवान राम। ‘ बस इस एक वाक्य ने इसके फैलाव से जुडे सत्य को बता दिया। छात्र जीवन मे दसवी कक्षा मे बच्चो के लिये आयोजित विज्ञान सम्मेलन मे तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता ले लिये मै धमतरी गया। प्रतियोगियो को चिट निकालनी पडती थी फिर चिट पर लिखे विषय पर भाषण देना होता था। मुझे गाजर घास पर बोलने के लिये कहा गया। उस समय किताबी ज्ञान था थोडा बहुत इसलिये ज्यादा अच्छे से नही बोल पाया। बाद मे मैने इस पौधे के विषय मे विस...