Sunday, May 31, 2009

क्या महंगे विदेशी फलो के खराब निकलने की समस्या से आप भी जूझ रहे है?

क्या महंगे विदेशी फलो के खराब निकलने की समस्या से आप भी जूझ रहे है?
- पंकज अवधिया


आजकल भारतीय शहरो मे स्टीकर लगे विदेशो से आयातित फल धडल्ले से बिक रहे है। इसका नियमित प्रयोग सबके बस की बात नही है क्योकि ये बहुत महंगे होते है। मसलन अभी रायपुर मे अयातित सेव का दाम 120 रुपये किलो है और एक किलो मे मुश्किल से पाँच सेव चढते है। फुटकर मे देखे तो 20-30 रुपये का एक सेव। आजकल चिकित्सक मरीजो को इन्ही महंगे फलो को उपयोग मे लाने की सलाह दे रहे है। यही कारण है कि सुबह विदेशी फलो से सजी दुकान शाम तक खाली हो जाती है।

कुछ दिनो पहले एक मित्र के साथ मै फलो की दुकान पर पहुँचा। आयातित नाशपाती लेने का मन हुआ। एक-एक किलो हमने ले लिया। घर जाकर जब उसे काटा तो अन्दर फलो की स्थिति इस चित्र की तरह थी। यह खाने लायक नही था। ज्यादातर फल ऐसे ही निकले। हम उल्टे पैर वापस लौटे। फल महंगा था इसलिये फल वाले ने तुरंत इन्हे वापस ले लिया और बदले मे उसी जगह से दूसरे फल दे दिये। दुर्भाग्यवश नये फलो मे भी वही समस्या दिखी। फल वाले ने कहा कि आजकल इस “बीमारी” की शिकायत बहुत आ रही है। मैने पूछा कि ये फल कहाँ से आ रहे है? उसने झट से कहा, न्यूजीलैंड से।

मैने प्रभावित फलो की तस्वीरे ली और फिर पेस्टनेट नामक याहू ग्रुप मे इसके बारे मे साथी वैज्ञानिको को बताया। पेस्टनेट से दुनिया भर के सैकडो कृषि विशेषज्ञ जुडे हुये है। हर तकनीकी विषय पर आपस मे वे खुलकर चर्चा करते है और इस तरह एक-दूसरे के ज्ञान को समृद्ध करते है। पेस्टनेट मे सन्देश डालने पर व्यापक प्रतिक्रियाए हुयी। बहुत से देशो के वैज्ञानिको ने बताया कि उन्होने भी न्यूजीलैंड से आयातित फलो मे यह समस्या देखी है। यह फलो को तोडने के बाद परिवहन मे होने वाली गडबडी के कारण हुआ है। हो सकता है कि न्यूजीलैंड के किसानो के खेत मे ही इस समस्या का कारण छिपा हो। चर्चा चलती रही। इस बीच एक तीखी प्रतिक्रिया ने मुझे चौका दिया।

न्यूजीलैंड मे फलो के निर्यात से जुडे एक सलाहकार ने तीखे शब्दो मे मुझे लिखा कि यह विश्व समुदाय के सामने न्यूजीलैंड के फल व्यापार को प्रभावित करने की साजिश है। पंकज अवधिया इस बात का प्रमाण दिखाये कि ये फल न्यूजीलैंड से भारत आये है। फिर कुछ घंटो बाद उनका एक और सन्देश आया कि अधिकारिक दस्तावेजो के अनुसार न्यूजीलैंड से इस साल एक भी सेव या नाशपाती भारत नही भेजा गया है।

मैने अपने फल वाले से वह बाक्स माँगा जिसमे फल थोक मे आते है। बाक्स मे चीन की सील लगी थी। उसमे कही भी न्यूजीलैंड नही लिखा था। यह अलग बात है कि उन्हे इसे न्यूजीलैंड का बताकर बेचा जाता था। बहरहाल, मैने न्यूजीलैंड के उस सलाहकार से क्षमा माँग ली। तब तक पेस्टनेट मे चर्चा ने और जोर पकड लिया था। काफी खोजबीन के बाद वैज्ञानिको ने निष्कर्ष निकाला कि “कूल चेन” ब्रेक होने के कारण ऐसा हुआ है। सेव और नाशपाती ठंडी जलवायु के उत्पाद है। ये न्यूजीलैंड से सिंगापुर आते है। यहाँ से भारतीय और चीनी व्यापारी इसमे अपना ठप्पा लगाकर अपने बक्सो मे भरकर भारत भेजते है। इसी दौरान “कूल चेन” ब्रेक हो जाती है। “कूल चेन” मतलब किसान के खेत से फलो को एकत्र करने से लेकर उपभोक्ता के पास पहुँचने तक इन फलो को रेफ्रीजरेटर मे रखा जाना चाहिये। पर इस बात पर ध्यान नही दिया जाता है और फल खराब होने लगते है।

तो क्या चीनी व्यापारी गडबड करते है? मैने बक्से का निरिक्षण किया तो उसमे साफ-साफ लिखा था कि शून्य डिग्री मे इस बक्से को रखा जाये पर भारत मे फल विक्रेता इसका पालन नही करते है। वे खुले मे इन फलो को बेचते है। रायपुर मे तो जब पारा 46 के पार होता है तब भी खुले मे ये फल रखे जाते है। ऐसे मे इनका खराब होना तय है। ऐसा कमोबेश पूरे देश मे होता होगा। अब फल वालो को तो समझाना मुश्किल है। ऐसे मे उपभोक्ताओ को ही जागना होगा।

उपभोक्ता उन दुकानो से ऐसे फलो को ले जहाँ रेफ्रीजरेटर मे उन्हे रखा गया हो। यह सम्भव नही हो तो घर लाकर आप अपने फ्रिज मे रखकर उन्हे खराब होने से बचा सकते है। मै तो देशी फलो का हिमायती हूँ पर फिर भी जिन्हे आयातित फलो का नियमित सेवन करना पडता है उनके लिये इस वैज्ञानिक चर्चा को सामने रखना मै सही समझता हूँ। ज्यादातर घरो मे खराब फल लौटाये नही जाते है। यह रवैया ठीक नही है। आप तुरंत उसे लौटाये और बदले मे ताजे फल ले। सभी ऐसा करने लगे तो शायद फल विक्रेताओ की अक्ल ठिकाने आ जाये।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)


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Saturday, May 30, 2009

विकास, छत्तीसगढ और पितृ वृक्ष

“छत्तीसगढ मे तथाकथित विकास की बलिवेदी पर चढाये गये जीवनदाता वृक्ष” ये लेखमाला आज से मेरी प्रतिक्रिया ब्लाग पर आरम्भ हुयी है। यह लेखमाला उन असंख्य बेजुबान वृक्षो को समर्पित है जिन्होने अपना जीवन पीढीयो तक मानव सेवा के लिये दे दिया। पर आज इस पीढी के आधुनिक सोच वाले योजनाकारो ने तथाकथित विकास के नाम पर इन्हे जड से काटने मे जरा भी देर नही लगायी। यह सम्भव था कि आज विकास के इस युग मे ये भी हमारे बीच रहते पर ऐसे सारे विकल्पो की अनदेखी कर दी गयी। मैने अपना जीवन इन पितृ वृक्षो के साये मे गुजारा है और अब भी गुजार रहा हूँ। इस लेखमाला के माध्यम से मै इन पुण्य आत्माओ से ज़ुडी बातो को नम आँखो से याद करने का प्रयास कर रहा हूँ।

Saturday, April 18, 2009

क्या बीटी बैगन के अलावा कोई विकल्प नही है?

क्या बीटी बैगन के अलावा कोई विकल्प नही है? - पंकज अवधिया

एक विशेष प्रकार के कीडो के लिये विकसित किये गये बीटी बैगन की जरुरत क्या सचमुच भारतीय किसानो को है? क्या उन कीडो का नियंत्रण इतना मुश्किल हो गया है कि हम करोडो भारतीयो की जान दाँव पर लगाकर बीटी बैगन को भारत मे लाने व्यग्र है? यदि वैज्ञानिको से यह सवाल पूछा जाये तो वे शायद कहे कि हाँ, हाँ यह जरुरी है। पर बैग़न की खेती कर रहे किसान ऐसा नही कहेंगे। यह मेरा सौभाग्य है कि मै बैगन की पारम्परिक खेती कर रहे हजारो भारतीय किसानो से मिला हूँ। उनके पास गजब का पारम्परिक ज्ञान है। वे बिना किसी रसायन के बैगन को कीटो से बचा रहे है। उनके ज्ञान का यदि दस्तावेजीकरण किया जाये तो कृषि शोध संस्थानो के भवन छोटे पड जायेगे इन्हे रखने के लिये। ये महज किताबी ज्ञान नही है। किताबी ज्ञान होता तो न जाने कब का अतीत की गहराईयो मे खो जाता। यह ज्ञान खेतो मे फसलो पर प्रयोग हो रहा है और पीढी दर पीढी निखर रहा है। यह ज्ञान बैगन को कीटो से सदियो तक बचा सकता है। यह ज्ञान देश की असंख्य वनस्पतियो से सम्बन्धित है। ये वनस्पतियाँ और इनसे सम्बन्धित ज्ञान सभी की पहुँच मे है। उन वैज्ञानिको की पहुँच मे भी जिन पर आजादी के बाद इस देश ने खरबो रुपये जाया कर दिये है। देश के प्रत्येक भाग मे कृषि शोध संस्थान है पर शायद ही कोई संस्थान किसानो के ज्ञान से कुछ सीख ले रहा है। कितना अच्छा होता कि किसान और वैज्ञानिक मिलकर इस ज्ञान को संवर्धित करते।

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Friday, April 17, 2009

क्या आप बीटी बैगन के लिये प्रयोगशाला जीव बनने तैयार है?

क्या आप बीटी बैगन के लिये प्रयोगशाला जीव बनने तैयार है? - पंकज अवधिया

अब एक बार फिर देश मे बीटी फसल की चर्चा है। इस बार बीटी बैगन आ रहा है। आ रहा है या कहे, आ गया है। समर्थक और विरोधी मोर्चे पर डटे हुये है। चूँकि यह क्लिष्ट तकनीकी विषय है इसलिये आम जनता इससे अंजान है। किसी ने उन्हे सरल भाषा मे समझाया नही। पर यह भी नग्न सत्य है कि इस बीटी बैगन को खाना उन्हे ही है। वैसे हमारे देश मे आम जनता से पूछने की परम्परा नही है। जनता नेताओ को चुन लेती है और वैज्ञानिक नेताओ से चिपक जाते है। बस ये दोनो ही आम जनता से पूछे बिना पाँच वर्षो तक अपना राज चलाते है। जनता मे से कोई पूछता है तो तकनीकी बाते करके उन्हे चुप कर दिया जाता है।

पूरा लेख यहाँ पढे

Sunday, January 18, 2009

कृषि होम्योपैथी पर हाल ही मे तैयार की गयी फिल्मे

Recent Films and Film strips on Agrohomoeopathic Experiments.

Oudhia, P. (2008). Agrohomoeopathic Experiments: Use of Homoe-Drug ARNICA in commercial cultivation of Indian medicinal and aromatic crops. 1. Tulsi (Ocimum sanctum). CGBD (Offline Database on Chhattisgarh Biodiversity), Raipur, India.


Oudhia, P. (2008). Agrohomoeopathic Experiments: Use of Homoe-Drug ARNICA in commercial cultivation of Indian medicinal and aromatic crops. 2. Hadjod (Cissus quadrangularis). CGBD (Offline Database on Chhattisgarh Biodiversity), Raipur, India.


Oudhia, P. (2008). Agrohomoeopathic Experiments: Use of Homoe-Drug ARNICA in commercial cultivation of Indian medicinal and aromatic crops. 3. Kali Musli (Curculigo orchioides). CGBD (Offline Database on Chhattisgarh Biodiversity), Raipur, India.


छत्तीसगढ की जैव-विविधता पर हाल ही मे तैयार की गयी फिल्मो की जानकारी इस पते पर मिल सकेगी।

http://cgbiodiversity.blogspot.com/2009/01/recent-films-and-film-strips-on.html

Wednesday, July 2, 2008

--- तो इसलिये नष्ट किया जा रहा रतनजोत (जैट्रोफा) भारतीय किसानो द्वारा

--- तो इसलिये नष्ट किया जा रहा रतनजोत (जैट्रोफा) भारतीय किसानो द्वारा
- पंकज अवधिया

कुछ दिनो पहले राजधानी के पास बडी तादाद मे उखाडे गये रतनजोत को देखकर मैने गाडी रुकवायी। रतनजोत को इस हालत मे मैने कभी नही देखा था। मेरे चालक ने कहा कि हो सकता है कि जलाउ लकडी के रुप मे इसका उपयोग होने लगा हो और इसलिये लोग इसे काटकर सुखा रहे हो। पर रतनजोत मे लेटेक्स होने के कारण यह अधिक उपयोगी जलाउ लकडी नही है। मैने तस्वीरे ली और आस-पास के लोगो से पूछा पर शायद सरकारी साहब समझ पर वे सहम से गये। कुछ आगे बढे तो रतनजोत के पौधो के ऐसे ढेर दिखे जिन्हे जलाया जा रहा था। लोगो ने बताया कि हम किसान है। सरकारी विभागो ने खेत की मेडो पर इसे लगा दिया था। खाद पानी मिलने से इन्होने राक्षसी रुप धारण कर लिया। फिर ये खेतो मे घुसने लगे। खेतो मे तो परम्परगत फसले होती है और रतनजोत क्या, किसी भी घुसपैठिये को अन्दर आने की अनुमति नही देते है किसान। सो उन्होने अन्य खरपतवारो की तरह इसे भी उखाडा और जला दिया। मेरे कहने से पहले ही वे बोले कि यदि इसी रफ्तार से इसे रोपा जाता रहा तो ये अधिक ताकत से अपने बीज फैलायेंगे और खेतो मे किसानो के लिये नया सिरदर्द बनेंगे।

पूरा लेख इस कडी पर पढे

http://ecoport.org/ep?SearchType=earticleView&earticleId=3180&page=12369


Tuesday, July 1, 2008

कम से कम ऐसी अनदेखी तो न करे गाजर घास के प्रकोप की?

कम से कम ऐसी अनदेखी तो न करे गाजर घास के प्रकोप की?
- पंकज अवधिया

गाजर घास के प्रकोप के बीच काम करना आसान नही है। उन्होने बताया कि इसे उखाडने के बाद सिर और सारा शरीर भारी लगने लगता है। आँखो मे कडवाहट भर जाती है। शायद उन्हे इस बात की जानकारी नही थी कि गाजर घास से सबसे बडा खतरा एलर्जी का है। त्वचा प्रदाह और साँस के रोग सबसे पहले पकडते है। मैने उन्हे यह जानकारी दी तो वे बोले कि सर्दी तो रहती ही है पर यह नही पता चल रहा था कि अचानक से क्यो शुरु हो गयी है यहाँ काम पर आने के बाद। वहाँ काम कर रहे दूसरे मजदूरो ने बताया कि शहरो से जो खाद लायी गयी उसके साथ गाजर घास के बीज यहाँ तक पहुँचे। पहले गिनती के पौधे थे पर अब तो जैसे उनका राज ही हो गया है।

पूरा लेख इस कडी पर पढे

http://ecoport.org/ep?SearchType=earticleView&earticleId=3178&page=-2